📍 रांची, झारखंड | 8 जुलाई 2025
✍️ विश्लेषण: [ हिमांशु पाठक]
🔍 पृष्ठभूमि: AJSU (P) के साथ बीजेपी का गठबंधन — लाभ या बोझ ?
झारखंड में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन पार्टी [AJSU (P)] का गठबंधन पिछले एक दशक से बना हुआ है, लेकिन आंकड़े और ज़मीनी हकीकत अब यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या इस गठबंधन से भाजपा को फायदा हो रहा है या नुकसान?
🗳️ 2014: बिना गठबंधन के बेहतर प्रदर्शन की क्षमता
- लोकसभा 2014: BJP को 39.9% वोट मिले
- 56 विधानसभा क्षेत्रों में सबसे आगे
विधानसभा 2014:
- गठबंधन के तहत 72 सीटों पर लड़ी BJP
- वोट प्रतिशत गिरकर 31.3%
- कुल सीटें: 37
- यदि अकेले लड़ती तो आंकड़ा 41 या उससे अधिक तक जा सकता था
🔹 AJSU (P) ने तब लोकसभा में सभी प्रत्याशी गंवा दिए थे, लेकिन गठबंधन की वजह से विधानसभा में पुनर्जीवित हो गई।
🧭 रघुवर दास का संतुलन: सरकार में रहते हुए भी गठबंधन विरोधी तेवर
AJSU (P) सरकार में भी शामिल रही, लेकिन कई बार CM रघुवर दास के निर्णयों पर खुला विरोध भी करती रही, इसके बावजूद गठबंधन बना रहा — इसे राजनीतिक नैतिकता का परिचायक माना गया
📉 2019 में गिरते आंकड़े और गिरिडीह का बड़ा “त्याग”
BJP ने गिरिडीह जैसी मजबूत सीट AJSU (P) को दे दी
नतीजा:
- BJP की सीटें 12 से घटकर 11
- AJSU (P) को कोई विशेष बढ़त नहीं
- BJP का वोट प्रतिशत 33.37% पर स्थिर रहा
🗳️ 2024: गठबंधन बना रहा, लेकिन सीटें और वोट दोनों गिरे
- गठबंधन रहते हुए भी BJP की सीटें घटकर 21
- वोट प्रतिशत: 32.18%, जो कि 2019 के 33.37% के करीब ही है
- AJSU (P) ने 10 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल 1 सीट जीत पाई (वो भी 232 वोट के मामूली अंतर से)
🔹 रोचक तथ्य: AJSU से आए एकमात्र प्रत्याशी रोशनलाल चौधरी ने भाजपा से बड़कागांव में जीत हासिल की — यह BJP के लिए गठबंधन से बेहतर निवेश साबित हुआ
💬 राजनीतिक नैतिकता बनाम रणनीतिक समयबद्धता
2019 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले AJSU (P) ने गठबंधन तोड़ दिया. इससे BJP को रणनीतिक तैयारी का मौका नहीं मिला. रघुवर दास के पास विकल्प थे, लेकिन अंतिम समय के धोखे ने भाजपा को चुनावी नुकसान पहुंचाया
🩸 “यही वह क्षण था जब बीजेपी लहूलुहान हो गई। अगर समय रहते गठबंधन टूटता, तो 8–10% वोट की संभावित बढ़त मिल सकती थी।”

आंकड़े साफ़ इशारा करते हैं कि AJSU (P) को बार-बार संजीवनी मिली, लेकिन BJP को सीट और वोट प्रतिशत में अपेक्षित लाभ नहीं मिला। गठबंधन की राजनीतिक नैतिकता और सामयिक रणनीति दोनों पर पुनर्विचार करने का समय अब आ गया है — खासकर तब जब जमीनी कार्यकर्ता और नेतृत्व खुद इस गठबंधन पर सवाल उठाने लगे हैं।
