📍 नई दिल्ली | 22 जुलाई 2025
✍️ विशेष लेख: राजीव कुमार ओझा
राहुल गांधी के लिए अक्सर यह टिप्पणी की जाती है कि जिस परिवार के तीन-तीन सदस्य देश के प्रधानमंत्री रह चुके हों, उसके वारिस को जब देश में बेरोजगारी जैसे गंभीर सवाल उठाने का अधिकार है या नहीं, या उसके आरोपों का जवाब खुद उनके परिवार को देना चाहिए, न कि मौजूदा प्रधानमंत्री को. यह मुद्दा भारतीय राजनीति की बहसों में बार-बार सामने आता है.
पहली नजर में ऐसा कहना राजनीतिक रूप से उचित नहीं है, क्योंकि सवाल उठाने का अधिकार संविधान ने हर नागरिक को दिया है. राहुल गांधी एक सांसद और विपक्ष के नेता हैं. ऐसे में बेरोजगारी, महंगाई या अन्य जनसमस्याओं पर सरकार से सवाल पूछना उनका दायित्व बनता है, चाहे उनका परिवार कितना भी शक्तिशाली रहा हो.
नेहरू-गांधी परिवार निस्संदेह बीते सौ सालों से राजनीति में केंद्र में रहा है और तीन-तीन प्रधानमंत्री इस परिवार से आए हैं—जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी. लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने देश के लिए अपनी जान तक दी है. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या भी इस परिवार के राजनीतिक सफर का हिस्सा है.
कई बार विपक्ष या समर्थक आरोप लगाते हैं कि देश में अगर बेरोजगारी या गरीबी है तो इसके लिए पूर्व की सरकारें विशेषकर कांग्रेस और गांधी परिवार जिम्मेदार हैं. कहने का आशय यह होता है कि 70 साल के कार्यकाल में अगर समस्याएं दूर नहीं हो पाईं तो वर्तमान सरकार को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं.
लेकिन इससे यह नहीं निकलता कि मौजूदा सरकार पर सवाल उठाए ही न जाएं. लोकतंत्र में हर सरकार, चाहे वह किसी भी प्रधानमंत्री की हो, उसकी जवाबदेही तय होती है. जब नरेंद्र मोदी सरकार चुनकर आई थी तो उन्होंने भी पुराने सिस्टम, कांग्रेस की नीतियों और कथित विफलताओं को बदलने और नए भारत की बात की थी.
राहुल गांधी अगर अपने परिवार के इतिहास से घिरे हैं तो यह उनका न तो सिर्फ सकारात्मक पक्ष है और न ही सिर्फ नकारात्मक. उनके परिवार ने देश को दिशा दी है, गलतियां भी की हैं, प्रयोग भी किए और बड़े-बड़े फैसले भी लिए. आज अगर राहुल बेरोजगारी पर सवाल उठाते हैं तो वह एक जिम्मेदार विपक्षी नेता की भूमिका निभा रहे हैं.
‘परिवारवाद’ और वंशवाद के आरोप इस परिवार पर लगते रहे हैं; लेकिन इससे यह तर्क सही नहीं हो जाता कि देश में कोई भी वर्तमान मुद्दा सिर्फ अतीत की भूलों की वजह से है. समय के साथ हर सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह समस्याओं का समाधान करे, चाहे वह बेरोजगारी हो या गरीबी.
वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कभी-कभी जवाब देते समय यह तर्क दिया जाता है कि पूर्ववर्ती सरकारों, खासकर गांधी परिवार, का रिकॉर्ड देखें. यह उनकी राजनीति का हिस्सा है. लेकिन एक लोकतांत्रिक बहस में जरूरी है कि हर दौर की सरकार अपने वादों और फैसलों पर भी जवाबदेह रहे.
इसलिए मेरी राय में, राहुल गांधी का सवाल उठाना लोकतंत्र के हित में है. उनके परिवार का अतीत चाहे जैसा रहा हो, मौजूदा मुद्दों का जवाब मौजूदा सरकार को देना ही होगा. पिछले कार्यकालों की आलोचना से वह जिम्मेदारी खत्म नहीं होती, यह लोकतंत्र की बुनियाद है.
