नागपुर, 29 जून: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई ने नागपुर में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि यह निर्णय देश को एक संविधान के तहत लाने के लिए जरूरी था। उन्होंने कहा कि एक राष्ट्र, एक संविधान की अवधारणा को साकार करने के लिए यह ऐतिहासिक कदम उठाया गया।
एक संविधान की जरूरत पर बल
बीआर गवई ने कहा,”देश को एक सूत्र में बांधने और संविधान की एकरूपता बनाए रखने के लिए धारा 370 को हटाना जरूरी था। जब एक देश में दो संविधान होते हैं, तो राष्ट्रीय एकता पर असर पड़ता है।” उन्होंने यह भी कहा कि संसद ने जब अनुच्छेद 370 को हटाने का निर्णय लिया, तब वह पूरी तरह से संविधान के प्रावधानों के अनुसार था। यह निर्णय न केवल कानूनी दृष्टिकोण से उचित था, बल्कि यह देश की अखंडता और संप्रभुता के लिए भी आवश्यक था।
संविधान की सर्वोच्चता पर जोर
मुख्य न्यायाधीश ने अपने संबोधन में कहा कि संविधान न केवल अधिकार देता है, बल्कि नागरिकों को उनके कर्तव्यों की भी याद दिलाता है। उन्होंने कहा कि देश को चलाने के लिए एक समान संविधान जरूरी है, ताकि हर राज्य और हर नागरिक को समान अधिकार और कर्तव्य मिल सकें।
“हमारा संविधान युद्ध और शांति दोनों समय में मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। यह हमें दिशा देता है कि किस परिस्थिति में कैसे निर्णय लेना चाहिए,” – बीआर गवई
न्यायपालिका की भूमिका पर टिप्पणी
सीजेआई गवई ने स्पष्ट किया कि भारत की न्यायपालिका संविधान की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि हर फैसला, विशेष रूप से ऐसा ऐतिहासिक निर्णय, केवल संवैधानिक मूल्यों और न्यायिक विवेक के आधार पर लिया जाना चाहिए — और अनुच्छेद 370 पर यही किया गया।
राजनीतिक निर्णय नहीं, संवैधानिक प्रक्रिया
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि धारा 370 को हटाना एक राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया थी, जिसे उचित विधिक प्रक्रिया के तहत लागू किया गया। यह निर्णय जम्मू-कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों के बीच की दूरी को कम करता है और सभी नागरिकों को समान अवसर प्रदान करता है।
मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई का यह बयान न केवल धारा 370 पर न्यायपालिका की सोच को दर्शाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि भारत की एकता, अखंडता और समानता के लिए एक संविधान का होना कितना जरूरी है।
