ओडिशा हाईकोर्ट ने रेप और हत्या के दोषी की फांसी की सजा बदली, नमाज पढ़ने का हवाला दिया — उठे सवाल

भुवनेश्वर, 29 जून: ओडिशा हाईकोर्ट ने एक हैरान कर देने वाला फैसला सुनाते हुए छह साल की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के दोषी शेख आसिफ अली की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। फैसले में कोर्ट ने आरोपी के “धार्मिक आचरण” का हवाला देते हुए कहा कि वह अब नियमित रूप से नमाज पढ़ता है और अपने अपराध के लिए ईश्वर के सामने आत्मसमर्पण कर चुका है।

फैसले के तर्क पर उठे सवाल

जस्टिस एसके साहू और जस्टिस एमएस पात्रनायक की पीठ ने 106 पेज के इस फैसले में कहा कि,“आसिफ अब दिन में कई बार नमाज अदा करता है और उसने खुदा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। इसलिए अब उसे जेल में जीवनभर रहने की सजा दी जाए।” हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोषी को ताउम्र जेल में रखने का आदेश दिया गया है और वह समय से पहले रिहा नहीं किया जाएगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला छह साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म और उसकी हत्या से जुड़ा है, जिसमें निचली अदालत ने आसिफ अली को फांसी की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने मामले को “दुर्लभतम में दुर्लभ” (rarest of rare) की श्रेणी में न मानते हुए फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया।

जनता और विशेषज्ञों में नाराज़गी

इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया और कानूनी हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कई लोगों ने यह सवाल उठाया है कि क्या धार्मिक आचरण को आधार बनाकर एक जघन्य अपराध के दोषी को राहत दी जा सकती है ?

ओडिशा हाईकोर्ट का यह फैसला कानूनी दृष्टि से भले ही तर्कपूर्ण हो, लेकिन समाजिक और नैतिक दृष्टिकोण से इस पर गहन बहस शुरू हो गई है। क्या अपराध के बाद का धार्मिक आचरण सजा को कम करने का आधार हो सकता है? यह आने वाले समय में एक बड़ी संवैधानिक चर्चा का विषय बन सकता है।

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