नई दिल्ली, 29 जून : ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने चुनाव आयोग पर बड़ा और गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि आयोग बिहार में गुप्त रूप से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) जैसी प्रक्रिया को लागू कर रहा है। ओवैसी के अनुसार, यह प्रक्रिया विशेष रूप से सीमांचल और गरीब तबकों के मताधिकार पर हमला है।
ओवैसी ने क्या कहा?
ओवैसी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए कहा कि अब बिहार में वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने के लिए नागरिकों को यह दस्तावेज़ों से साबित करना होगा कि वे और उनके माता-पिता कब और कहां पैदा हुए थे। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया सीधी एनआरसी जैसी कार्रवाई है, जो विशेषकर सीमांचल क्षेत्र के वंचित और दस्तावेज़विहीन लोगों के लिए चिंता का विषय है।
उनके अनुसार,“भारत में केवल तीन-चौथाई जन्म ही पंजीकृत होते हैं। ऐसे में गरीब, पिछड़े और सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे क्योंकि उनके पास जरूरी दस्तावेज़ों की भारी कमी होती है।”
चुनाव से पहले नियम लागू करना संविधान का उल्लंघन
ओवैसी ने इस प्रक्रिया को संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया और सुप्रीम कोर्ट के 1995 के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें मतदान पंजीकरण के लिए मनमानी प्रक्रिया को खारिज किया गया था। उन्होंने कहा कि चुनाव से ठीक पहले ऐसी प्रक्रिया को लागू करना मताधिकार को कमजोर करने का प्रयास है।
क्या है चुनाव आयोग का पक्ष?
अब तक चुनाव आयोग की ओर से इस गंभीर आरोप पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि ओवैसी के बयान से राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां पहले से ही एनआरसी और नागरिकता को लेकर असमंजस की स्थिति है।
ओवैसी का यह बयान न सिर्फ चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि मतदाता सूची में बदलाव से पहले पारदर्शिता और संवैधानिकता सुनिश्चित किया जाना कितना आवश्यक है। क्या चुनाव आयोग इस पर स्पष्टीकरण देगा — यह देखने वाली बात होगी।
