राजस्थान मिड-डे मील घोटाला : फर्जी मदरसों के नाम पर ₹3.19 करोड़ का भुगतान, संविदाकर्मियों के रिश्तेदारों के खातों में भेजी गई राशि

राजीव कुमार ओझा

भरतपुर/डीग: राजस्थान के भरतपुर जिले के डीग उपखंड में शिक्षा विभाग से जुड़े मिड-डे मील योजना में बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। पहाड़ी ब्लॉक के 20 मदरसों के नाम पर दो साल में ₹3.19 करोड़ का भुगतान उन खातों में किया गया जिनका इन मदरसों से कोई संबंध नहीं है। यह राशि संविदाकर्मियों के रिश्तेदारों जैसे पत्नी, भाई, दादा और मित्रों के खातों में ट्रांसफर की गई।

कैसे हुआ घोटाला ?
शिक्षा विभाग के सीबीईओ कार्यालय में कार्यरत संविदाकर्मी क्रांतिकारी शर्मा और विशाल पाठक ने अपने परिजनों के नाम से 22 फर्जी बैंक खातों में मिड-डे मील योजना की राशि ट्रांसफर करवाई। इन खातों के धारकों का इन मदरसों से कोई लेना-देना नहीं था।

जांच में सामने आया कि भुगतान गेहूं-चावल, मिल्क पाउडर और हेल्पर की पेमेंट के नाम पर किया गया।

गेहूं-चावल सप्लाई: ₹34 लाख
मिल्क पाउडर: ₹85.7 लाख
हेल्पर व कुक भुगतान: ₹2 करोड़+

जांच में सामने आए फर्जीवाड़े के 4 पैटर्न

मदरसों का अस्तित्व ही नहीं:
खेड़ली अलीमुद्दीन भौंरी, कढौल, थलचाना जैसे 5 मदरसों का मौके पर कोई अस्तित्व नहीं मिला।

मदरसों का अस्तित्व है, लेकिन मिड-डे मील के लिए कोई स्वीकृति नहीं:
वमनवाड़ी, राशिदुल कुरान गोपालगढ़, शिफा एजुकेशन पहाड़ी जैसे संस्थानों को मिड-डे मील योजना की स्वीकृति ही नहीं मिली थी।

मदरसों को स्वीकृति थी, फिर भी भुगतान फर्जी खातों में हुआ:
हुजरा घीसेड़ा, सोमका जैसे मदरसे मौजूद हैं, लेकिन उनका भुगतान किसी और के निजी खाते में किया गया।

स्वीकृति नहीं, फिर भी सीधा भुगतान:
अनुपम पब्लिक स्कूल, जामिया हबीबिया जैसे संस्थानों को स्वीकृति के बिना ही फंड ट्रांसफर कर दिया गया।

जिम्मेदार कौन ?
जांच रिपोर्ट के अनुसार, दो संविदाकर्मियों ने एक-दूसरे के आईडी पासवर्ड से लॉगिन कर फर्जी खातों में पैसे डाले। सीबीईओ, जिला शिक्षा अधिकारी, पोषाहार शाखा — इन सभी की भूमिका संदिग्ध, लेकिन अभी तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं।

जब मामला खुला तो गायब हुई फाइल
भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, जैसे ही घोटाले की खबर बाहर आई, भरतपुर शिक्षा विभाग कार्यालय से संबंधित फाइल चोरी हो गई। इससे साफ है कि मामला दबाने की कोशिश हो रही है।

क्या कार्रवाई हुई ?
फिलहाल, सिर्फ क्रांतिकारी शर्मा और उनके परिवारजनों पर एफआईआर दर्ज हुई है। लेकिन उच्चाधिकारियों पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जिन्होंने भुगतान को मंजूरी दी। राजस्थान के शिक्षा विभाग में यह घोटाला प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें उजागर करता है। अब सवाल यह है कि क्या इस घोटाले के असली दोषियों पर कार्रवाई होगी या यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा ?

22 फर्जी खातों में भेजी गई राशि
जांच में पाया गया कि 22 ऐसे बैंक खातों में ट्रांजेक्शन हुए जिनका मदरसों से कोई सीधा संबंध नहीं था। इन खातों के धारक संविदाकर्मियों के परिजन व मित्र थे। इन खातों में दो वर्षों तक गेहूं, चावल, मिल्क पाउडर और हेल्पर के नाम पर भुगतान होता रहा। जब मामला उजागर हुआ, तो शिक्षा विभाग के भरतपुर स्थित कार्यालय से संबंधित फाइल ही चोरी हो गई। हैरानी की बात यह है कि अब तक सिर्फ दो संविदाकर्मियों पर एफआईआर दर्ज हुई है, जबकि उनकी रिपोर्टिंग अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। निरीक्षण रिपोर्ट अधूरी रही, फर्जी मदरसों का कोई जिक्र नहीं हुआ। जांच के आदेश सभी मदरसों के लिए थे, पर रिपोर्ट सिर्फ 17 की ही दी गई। भुगतान प्रक्रिया में शामिल उच्च अधिकारियों ने अनदेखी की।

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